Skip to main content

असुरक्षित जनता उनकी वजह से मजबूत नेता

यह एक विडंबना ही कहिए कि देश का लगभग हर व्यक्ति अपने आप को असुरक्षित समझता है कहीं ना कहीं अंतर्मन से हताश और निराश भी है और जब भी कोई व्यक्ति इस अवस्था में होता है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष संरक्षक ढूंढते हैं और इन हताश निराश दबे कुचले लोगों को राजनीतिज्ञ लोग संरक्षक महसूस होते हैं और शायद इसीलिए आम जनता अलग-अलग स्तर के राजनेताओं की चापलूसी कर उसके नजदीक रहना चाहती है कुछ लोग इसे स्वार्थ बोलते हैं लेकिन ऐसी जनता को स्वार्थी कहना उनके साथ अन्याय है यदि समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग जनता को नाकारा और निकम्मा समझते हैं तो वह शायद इसलिए क्योंकि बुद्धिजीवी लोगों के पेट में रोटी है और बोलने के लिए जबान है कहीं ना कहीं तर्कशक्ति भी होगी जिससे वे स्वयं को सुरक्षित कर पाते हैं और जो वैसे हम सुरक्षित हैं तो उन्हें किसी की चमचागिरी की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती चमचागिरी हम भक्तों को भी कह सकते हैं और अ भक्तों को भी। लेकिन यह तमाम बुद्धिजीवी लोग मिलकर अपने सारे घोड़े खोल कर भी देश की जनता के अंदर सुरक्षा का भाव नहीं दे पाते और जब भी किसी स्थान पर इन्हें मंच मिले तो बोलते देखते हैं कि जनता एक साथ आ जाए तो देश बदल जाएगा पता नहीं यह किस जनता की बात करते हैं ऐसी जनता की जिसे यह बुद्धिजीवी लोग पूछते रहते हैं और राजनेता अपना नौकर समझते हैं
मजे की बात यह है कि इन दबे कुचले लोगों के पीछे जो नेता होते हैं वह मजबूत स्वयं की वजह से नहीं होते। बल्कि जिस के जितने ज्यादा फॉलोअर्स यह समर्थक हैं वह नेता उतना ही मजबूत होता है यदि यह जनता अपना हाथ उस नेता के सर से हटा ले तो वह नेता भी सड़क पर आ जाएगा और वह भी हताश और निराश दिखेगा लेकिन यहां थोड़ी सी बुद्धि की कमी है की जनता एकजुट नहीं है और नेता जी को पता है कि यह मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाने वाले मैं नहीं तो इन्हें किसी और नेता के अधीनस्थ जाना होगा यह स्वयं कभी खड़े नहीं होंगे और हमारा देश और उसका सिस्टम इसी वजह से खड़ा नहीं हो पा रहा क्योंकि देश की जनता जिसको भी नेता बनाती है वह नेता ही बन जाता है इंसान नहीं रहता पिछले 40 सालों के उदाहरण तो मेरे सामने हैं. मैं यहां इमानदार जनता तो कई कालखंड में बता सकता हूं लेकिन एक भी नेता ऐसा नहीं बता सकता जिसका उदय पिछले 40 वर्षों में हुआ हो और वह अपने आप को अंतर्मन से इंसान समझता हो आपकी नजर में कोई हो तो बताना संघर्षशील नहीं स्थापित बताना क्योंकि संघर्षशील को तो इंसान पर कर रहना ही पड़ेगा अन्यथा उसे कोई नेता नहीं बनाएगा जय हिंद वंदे मातरम

Comments

Popular posts from this blog

जनता का गुस्सा गलत लोगों पर निकलता है

मीडिया के हम गुलाम हो गए हैं जबकि कुछ लोग कहते हैं कि हमें राजनेताओं ने गुलाम बनाया है मैं यहां सहमत भी हूं और असहमत भी। देश में आए दिन अखबार या न्यूज़ चैनलों में नए नए घोटाले पब्लिश होते हैं और तथाकथित मीडिया चिल्लाकर कहता है हमने एक खुलासा कर दिया उस खुलासा का जनता पर असर ऐसा होता है कि सारे नेता भ्रष्ट हैं और इस देश में ऐसा ही चलेगा मीडिया भी उन घोटालों के पीछे संबंधित मंत्री या मुख्यमंत्री से बयान लेना चाहते हैं और इस बयानबाजी से आवाम के अंदर यह संदेश जाता है की यह राजनेता या यह पार्टी भ्रष्ट है और हमें इन्हें बदलना है और मीडिया से यह संदेश लेकर जनता सत्ता का परिवर्तन कर भी देती है लेकिन जब दूसरे लोग सत्ता में आते हैं दूसरी पार्टी सरकार बनाती हैं तो घोटालों के मुख्य अभियुक्त यानी सरकारी अधिकारी ,आईएएस जैसे लोग वापस नई पार्टी के साथ मिलकर ,उन्हें सेट करते हैं ।और फिर से एक नए घोटाले को अंजाम देने में लग जाते हैं क्योंकि देश की व्यवस्था के अंदर राजनेताओं को शिक्षा देने की कोई व्यवस्था नहीं है उनके लिए कोई ऐसी परीक्षा भी नहीं है जिससे उन्हें प्रोफेशनल ज्ञान हो उन्हें सिर्फ वोट लेने के...