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दिमाग से दिवालिया लोगों की सलाह ना लें

किसी भी व्यक्ति के आगे बढ़ने या पीछे जाने के पीछे मतलब वह उन्नति कर रहा है या वह बर्बाद हो रहा है यह सब तय करने के लिए बड़े बुजुर्ग और बुद्धिजीवी कहते हैं कि आदमी की संगत कैसी होगी वह वैसा ही बनेगा अब यह संगत कहां से आएगी संगत का तात्पर्य तो यही है कि जो आपके आसपास लोग रहते हैं वही आपके संगत है अब जब हम हिंदुस्तान की वर्तमान दशा और दिशा की बात करेंगे तो यहां एक तो पूंजी वाले लोग हैं अमीर लोग हैं और फिर बच्चे कुछ गरीब है मध्यमवर्गीय में लगभग नहीं आते ऐसा मैं मानता हूं क्योंकि मध्यमवर्गीय वर्ग केवल सरकारी आय के हिसाब से ही है लेकिन जो किसी से भी डरे जिसे कोई भी डरा सके और जो हमेशा अपने और अपने परिवार का पेट पालता हो सरकारों से मध्यमवर्गीय कह सकती है लेकिन मेरे हिसाब से वह गरीब ही होगा
 देश में यही 2 वर्ग है अब कई बार मैंने विचार किया की हमें उन्नति करना है या हमें राजनीति को दिशा देनी है या हमें आवाम के लिए कुछ काम करना है तो मैंने कोशिश की अपनी विचारधारा के साथ किसी से बात भी की जाए ताकि हम आंकलन कर सकें जो हम सोच रहे हैं वह सही है या नहीं लेकिन यह सब कुछ करने पर मैंने पाया कि जिसके साथ भी पेट के आंकलन करने की सोचते हैं वह सभी दिमाग की रुप से दिवालिया हैं वह या तो सरकार के साथ हैं यह सरकार के खिलाफ है वह या तो अमीरों के साथ है या अमीरों के खिलाफ है मतलब बीच का मध्य विचारधारा उनके पास कुछ भी नहीं अब ऐसे में यदि आप कोई एक बड़ा राजनीतिक सामाजिक परिवर्तन लाना चाहते हैं तो पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग यदि आपके आसपास होंगे तो भी आपको कोई सलाह नहीं दे सकते ऐसे में  अपने इस ब्लॉग में सिर्फ यही कह सकता हूं कि यदि आपको सलाह लेनी है तो सिर्फ और सिर्फ अच्छी किताबों से ले देश-विदेश में घटी हुई घटनाओं से सबक लें साथ ही यह तय कर लें कि यदि आपको मंजिल से भटकना है तो यहां के बुद्धिजीवियों से बात की जा सकती है और यदि आप के अध्ययन से आपके ज्ञान से आपके सामने कोई तस्वीर स्पष्ट है तो बिना किसी की सलाह लिए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ जाना चाहिए अन्यथा हम कब अपने लक्ष्य से भटक कर इन लोगों का कहना मानने लग जाएंगे कुछ नहीं कह सकते इसलिए संगत करनी हो तो इंसानों की नहीं किताबों की करनी चाहिए और किताबें भी किसी मस्तराम की लिखी हुई ना हो बल्कि बहुत ही बुद्धिजीवियों की द्वारा लिखी गई हो धन्यवाद शेष इसके बाद

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